सूर्यमल्ल मीसण
बूंदी रा राजकवि। 'वीररसावतार' रे रूप में चावा। डिंगल में ओज सूं ओतप्रोत 'वीर सतसई' अर पिंगल में 'वंश भास्कर' जैड़े वृहद ग्रंथ रा रचनाकार। 'राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी' रो सिरै पुरस्कार इणां रे नांव माथै देइजै।
बूंदी रा राजकवि। 'वीररसावतार' रे रूप में चावा। डिंगल में ओज सूं ओतप्रोत 'वीर सतसई' अर पिंगल में 'वंश भास्कर' जैड़े वृहद ग्रंथ रा रचनाकार। 'राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी' रो सिरै पुरस्कार इणां रे नांव माथै देइजै।
बाला चाल म बीसरे
भाभी ! हूं डोढ्यां खड़ी
बीकम बरसां बीतियों
दमँगल विच अ - पचौ
धीरा धीरा ठाकुरां
गोठ गया सब गेह-रा
इक-डंकी गिण अेक री
ईस ! घणा जे आखता
जंग नगारां जाण रव
ज खल भग्गा तो सखी
झंडा ओछाड़े गयण
जिण वन भूल न जांवता
जोगण ! पहली खाय पळ
कै दीठो हय आंवतो
कांकड़ त्रंबक त्रहकिया
कंत! घरै किम आविया
काय उताळी कंकणी
मतवाळा ! दळ आविया
मूझ अचंभो हे सखी
नागण जाया चिटला
नह पड़ोस कायर नरां
नीला ! मो पहली पड़ै
सहणी सबरी हूँ सखी
साथण ढोल सुहावणौ
सुण हेली ! ढोलै
सुणतां हाको धव सखी !
सूतो देवर सेज रण
टोटै सरकां भींतड़ा
वाज कुमैत विसासतो
वैद रहीजै राज-घर
विण माथै वाढै दळां