गोरउ सउ गात रसीली सी बात जाके आछे तीछे नयण काहेकुं मित्त ज्युं प्रीति न पाळत कवित्त (छप्पय) लोयण भरि निरखंत मेह कइ कारण मोर लवइ फुंनि नयन कुं देखी नाहिं सरवर जल तरु छांहड़ी सुंदर वेस लवेस अनोपम उमटी घनघोर घटा मन की