सुपनै री बस्ती में

उजास रै आंगणै

सुवारथ रा सपळोटिया

नीलटांस नै फंफेड़ दीवी।

सुपनै री बस्ती में

कर्सी री पळपळाट सूं

चूंधौड़ा जीव

असंख्य मिनखां रा

टापरा उजाड़'र

सोनचिड़ी री छाती पै

सुवारथ री चाक्की सूं

मिनखपणै ने पिसण लागर्या है।

जीवां रै सामै

हुंकारियां री कमी नीं

देखर मन कसमसावै

सुपने री बस्ती में

उजास रै आंगणै

सोनचिड़ी फड़फड़ावै

आस बधावै

चूंधौड़ा जीव

भटकतां-भटकतां

सागी ठौड़ आसी

नीं तो

रात नै रात

दिन नै दिन कैवणियां

उजास रै आंगणै

नूंवो रूख लगार सींचसी

अर

फळापसी रूंख।

चूंधौड़ा जीव

कुर्सी सूं भचभेड़ी खा’र

आपरो माजनो दे’र

उजास रै आंगणै

नागा हुय जासी।

चेतो जरूर आयसी।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत ,
  • सिरजक : रतन राहगीर ,
  • संपादक : डॉ. भगवतीलाल व्यास ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
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