इनै-बिनै च्यारुं कानी,

उड लियो गाणी-माणी

अेक कागलो मरै तिसायो

कठै मिल्यो नीं पाणी।

उडतां-उडतां अेक बाग

में, दीख्यौ अेक घड़ो।

थोड़ी आस बंधी तो

मन में हरख हुयो तकड़ो।

हेठां उतर घड़ै में झांक्यौ,

पाणी जाबक थोड़ो।

तिस मरतै रै पेट में ओजूं

आयो अेक मरोड़ो।

पाणी मिल्यो, चूंच पण छोटी

कांई करै अब काग?

मन में हुयो निरास, बो

सोचै, आज फूटग्या भाग।

होय निसासु बैठ गयो तो

भख लेवैलो काळ।

हिम्मत मन में हुयां,

कुण करै बांको कोई बाळ।

देख ठीकरी घड़ै कनै

उण जुगती अेक भिड़ाई।

उठा चूंच सूं अेक-अेक

घड़ियै रै मांय गिराई।

विपदा नै भी करै दूर,

जे हुवै अकल रो भोरो।

पाणी आग्यो ऊपर, पीय’र

हुयो घणो जी सौरो।

करमठ री जिनगाणी में नित,

नूंवा फूल खिलै है।

कैयग्या लोग पुराणा भायो!

चाह नै राह मिलै है।

स्रोत
  • पोथी : कुदरत रो न्याव ,
  • सिरजक : मंगत बादल ,
  • प्रकाशक : बोधी प्रकाशन, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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