कुरुक्षेत्र धरती रौ समर कोनी
मिनख री अंतरात्मा रौ
समर है।
जठै
रथां सूं वत्ता
विचार टकराया
जठै
तरवारां सूं वत्तौ
अहंकार टकरायौ।
अेक तरफ धरम रौ दावौ,
दूजी तरफ अधिकार री आग।
दोनां रै बीच में ऊभौ मिनख
आपरै ही रगत सूं
इतिहास लिख रह्यो हौ।
उण दिन रौ भाण धुंधळौ हौ
जाणतौ हौ—
आज धरती
फेरूं लाल व्हैला।
रण में घोड़ा हिणहिणाया,
शंख बाज्या,
ध्वजा फड़की,
अर हवा में पैली सूं तिरतौ
किणी मां रौ रुदन गूंज्यौ।
साम्ही ऊभौ अरजुण
आपरौ कुळ देख्यौ
गांडीव हाथ सूं छूटण लाग्यौ।
वो पूछ्यौ—
‘आ कैड़ी विजय है कै
इणमें जीतण खातर
अपणां प्रियजनां नै मारणा पड़सी?’
कृष्ण मुळक्या
गंभीर हुया
अरजुण! जुद्ध सूं पैली पीड़
सूं गुजरणौ व्हैला
धरम रौ रस्तौ सोरौ कोनी,
धरती कांपी
तीर उड़्या
आकास में
बीजळी चमकी
भीष्म घायल हुया
जाणै वगत थमग्यौ।
द्रोण रै भूमि माथै पड़तां ई
जाणै ज्ञान रौ माथौ झुकग्यौ।
कर्ण रै पड़तां ई
जाणै दान रौ सूरज डूबग्यौ।
अर जद सब खत्म हुया,
तद कुरुक्षेत्र मांय
बस सन्नाटौ पसरग्यौ।
सन्नाटौ
विधवा रौ रुदन
हवा मांय घुळग्यौ।
रण आंगण
सूनौ पड़ग्यौ।
धरती पर प्रश्न-ई-प्रश्न उमड़ग्या- ''धरम महान है तौ
घर क्यूं उजड़ग्या?
आज ई हर प्राणी में
अेक कुरुक्षेत्र क्यूं है?
सीमा पर?
राजनीति में?