अेक दिन

मैं नी रेवूंला

जद

म्हारै पछै कांई होसी?

नीमड़ै सूं

अेक-अेक कर

झरता

पाका-पीला पाना

फेरूं फूटणो

कूंपळां रो

नंग-धड़ंग टहनियां माथै

बायरा रो

आंगणो बुहारणो

ओळ्यूं पूछणो

होळै-होळै

चहल कदमी में

तरतीब होवणो

गळी री सून्याड़ रो

म्हारै

लाम्बी जातरा पै गयां पछै

रात रा ढळता पहर में

उगणी आडीनै देखती

चरकल्यां रो

मुधरो-मुधरो गीत गावणो

घर

रम्भावता बाछरू रो

कुदड़किया लगावणो

बांदणी खुल्यां पछै

अेक दिन

निश्चै है—

घाट पै थमैला।

थोड़ी'क देर थोड़ा'क पग

अर न्हायां पछै

आपणा-आपणा घरां

पळट जावणो

सगळो सूंप’र

रामजी री मरजी नै

अेक दिन

बालपणा री

किताब रा पानां री भांत

कोई जूनो दोस्त

कागद लिखण री सोचतो

मिलण नै आवैगा

पण

उण नै बाथां लेवण

बोल बतलावण खातर

म्हूं कोनी रेवूंला

अेक दिन।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रमेश ‘मयंक’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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