थे कितणा भी चीखो

चिल्लाओ

दहाड़ मारो

क्यूं ही आणा-जाणी कोनी

अगर थारी बातां में

दम है, लोच है

जरा सी भी ताकत है

तो थे भूचाळ ल्या सको

नहीं तो क्यूं ही होणा-जाणी कोनी

क्यूंकै खेतां में बिरखा आवै

जणा ही नाज निपजै

बाढ आण सूं नाज

कोनी निपज्या करै है...

अब सोच तो

थारी ही काम आसी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बनवारीलाल अग्रवाल ‘स्नेही’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-44
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