अेक दिन भाकपाटै सी’क
घरां सूं निकळती टेम,
म्हारै सामीं अेक साधुजी टपक पड़्या
अर म्हारै सूं बोल्या…
‘अलख निरंजन…! बच्चा धन्य भाग तेरा,
जो सुबै-सुबै बाबै रा दरसण कर रैयो है।
अर मेरो मन भी तनै आशीष देण रो कर रैयो है
म्हैं कैयो—‘हाथ जोड़्या बाबा!
आशीष लेतां-लेतां कमर झुकगी,
अर जिनगाणी री गाडी
आगै बढ़णै सू पैली ठौड़ ई रूकगी।’
बाबोजी कैयो–‘चिन्ता मत कर बाळक,
म्हैं तेरी गाड़ी नै धक्को लगास्यां।
पण पैली तूं म्हारी गाडी नै धक्को लगा।
म्हैं भांग छाण'र तेरै नाम रो डमरू बजास्यां।
चाल पैली दक्षिणा रा दस रिपिया निकाळ।’
म्हैं कैयो–‘बाबा बेरूजगारी
म्हारो डमरू पैली सूं ई बाज राख्यो है।
कै अेक जेब मांय आंसूं है,
दूजी मांय बाप री गाळी है
अर ऊपरली जेब खाली है।
नौकरी रो टोटो है
अर जिनगी बिना पींदै को लोटो है।
जोरू ना जाता, बेकारी सूं नाता।
छोरी रै बाप नै इंजिनीयर, डॉक्टर, बैरिस्टर चायै।
अर म्हारै बापजी नै टीवी, फ्रिज, स्कूटर चायै।
बाप म्हारो भिखारी हुयग्यो
अर ओ दहेज एड्स री बीमारी हुयग्यो।’
बाबोजी बोल्यो–'घबरा ना बाळक!
तेरे घर मै घणी लिछमी आवैगी।
अर बेकारी तेरै वास्तै वरदान बण ज्यावैगी।
म्हैं तेरो भविष्य संभाळा, तूं म्हारो वर्तमान संभाळ
अर दस रिपिया भी नीं है तो पांच ई निकाळ!’
म्हैं कैयो–‘देखो बाबा पांच रिपिया हुंवता तो
बजार सूं काळो रंग खरीद’र
उण सगळां रो मूंडो काळो कर देतो।
जिका जातिवाद रो जहर घोळ’र डण्ड पेल रैया है
अर मिनखां रै खून री होळी खेल रैया है।’
बाबोजी डरगो अर धीरै-सी बोल्यो–
‘अरै मूढ़ बाळक! धीरै बोल गर कोई सुण लेगो
तो तेरो चाचरो फोड़ैगो!
तेरै सागै म्हानै भी हलाल कर देगो।
बैठै ठाळै मुसीबत मत पाळ
अर पांच भी नीं है तो दो रिपिया ई निकाळ!’
म्हैं कैयो–‘दो भी हुंवता तो
थाणै मांय फोन कर’र कैंवतो
कै अेक साधु अेक शरीफ आदमी नै परेशान कर रैयो है,
जिको खुद पैली’ई भूख सूं मर रैयो है!’
बाबोजी झल्ला’र बोल्यो–
‘दो रिपिया भी कोनी तो अठै कांई करै है!
कपड़ा उतार, भभूत मल
अर साधु बणनै वास्तै म्हारै साथै चाल।
म्हैं भी लगोलग बोल पड़्यो–
‘बाबा! साधना में दम है तो आदमी नै साधु नीं
साधु नै आदमी बणा’र दिखाओ।
म्हैं तो जद मानां जद थे म्हां जैड़ा बेरूजगारां री
बिसात मै सामळ हुय ज्याओ।’
बाबो जी डाढी पंपोळ’र मुळक्या अर बोल्या—
‘गैलो होगो कांई?’
अगर साधु आदमी बणज्यागो तो कांई खावैगो?
अरै नादान!
संता रै देस मांय आदमी भूख सूं मरता रैया है,
पण साधु भूख सूं कदै नीं मरै है।
तूं नीं देगो तो कांई?
इतणै बड़ै देस मांय कोई तो अक्ल को आंधो मिलैगो
जिण सूं भर पेट भोजन
अर जरूरत रो सामान मिलैगो
बम-बम भोले अर तूं अठै सूं रफ्फू होलै…।’