देश की हालत माड़ी होगी,

घर-घर बिगड़्यो सांग अठै।

कींनै कह्वां कींनै समझावां,

कुवै पड़ी है भांग अठै॥

भ्रस्ट होया नेता अर अफसर,

लूट-लूट घर भरबा लाग्या।

लूट खसोट मचाई भारी,

सारा मिलकै देस नै खाग्या॥

काळा धंधा काळी कमाई,

अरबां खरबां जोड़्या दिन रात।

देस की दौलत करकै भेळी,

विदेस पूगादी रातोंरात॥

चोर-चोर मौसेरा भाई,

औरां को नहीं काम अठै।

कींनै कह्वां कींनै समझावां,

कुवै पड़ी है भांग अठै॥

महंगाई को जोर घणो है,

गरीब की कैंया पड़सी पेस।

घोटालां पर होवै घोटाला,

कैंया सुधरसी म्हारो देस॥

बाड़ खेत नै खावण लागी,

कैंया रूकसी या बरबादी।

भ्रस्टाचार मिटावण सारू,

अन्ना हजारे बणगो गांधी॥

कींनै कह्वां कींनै समझावां,

कुवै पड़ी है भांग अठै॥

चौसठ साल की बूढ़ी जवानी,

बहरी होगी कानां स्यूं।

आंख्या स्यूं भी सूझै कोनी,

अधमरी होगी ताना स्यूं॥

आजादी की कदर भूलग्या,

टाबर टौळी अर जवान।

अंग्रेज छोड़ग्या रोग कई,

कैंया रहसी भारत महान॥

ईमानदार बैठ्या है भूखा,

बेईमानां का ठाठ अठै।

कींनै कह्वां कींनै समझावां,

कुवै पड़ी है भांग अठै॥

गांवां की कांई बात बतावां,

मजदूर किरसाणां री कमर टूटगी।

भूख, गरीबी और बेकारी,

दीन-हीन की तकदीर फूटगी॥

रावण बैठ्यो गळी-गळी,

नारी की इज्जत खोवै है।

नेतावां कै जाळ में फंसकै,

आज भंवरियां रोवै है॥

झुकी सरम स्यूं गरदन म्हारी,

कैंया करां बखाण अठै।

कींनै कहवां कींनै समझावां,

कुवै पड़ी है भांग अठै॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सन्तोष कुमार जांगिड़ ‘पंछी’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-33
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