आज सैंग हिवड़ां रै आस नै विसवास री
प्रेम नै ‘सरधा’ रै साम-गान री
मिनख रै प्रेम नै उछाव रै तूफान री
अणगिणत गंगा-जमना
सूख रैयी है, सूख रैयी है।
जाणै क्यूं?
वैम री वीणा सूं
निरासा री रागळ्यां फूट पड़ी है
उण करामाती होठां रा
दोय-च्यार बोल ईज
अेटमी विनास रै रोळै-रप्पै नै
चुप्पो, बोलबालो कर दीन्यो है
नुंवै भावां रो
हिवड़ै री नुंवी पिछाणां रो।
उणरी पलक-पाखड़्यां मांय
जुग रो भंवरो रम रैयो हो
रोळोरप्पो थमग्यो है।
आज बो हिंवाळै जिस्यो प्राण
ऊंचो गरब-गुमान
हर मन नै तीरथराज बणावण सारू
गळणै हाळो प्राण
सिंसार रो अेक इंसान
चल्यो गयो है, चल्यो गयो
हिवड़ो छळ्यो गयो है, छळ्यो गयो
भळै अबै हर जीवण नै
हिंवाळो बणणो पड़ैला
अड़णो-लड़णो पड़ैला
गळणो पड़ैला।