जामन रो अेक महारूंख हो,

अेक झील रै तट पर।

उण पर रैंता घणा पंखेरु,

बणा-बणा अपणा घर।

बठै रैंवतो अेक बांदरो,

निज परिवार रै साथ।

खुसी-गमी में सगळां साथै,

प्रेम सूं करतो बात।

आखै दिन उछळ-कूद

कर, उधम मचांतो रैंतो।

करै जियां नट करतब,

बो भी खेल रचांतो रैंतो।

सगळा ‘पंख-पंखेरु’ उणनै,

देख-देख खुस होंता।

उण री अेक-अेक हरकत

नै, बड़ै मजै सूं जोता।

झील बिचाळै अेक सोवणो

टापू प्यारो-प्यारो।

उण पर रैंतो अेक मगरमछ,

इण सगळां सूं न्यारो।

जामन हेठ बिसाईं लेवण,

बो भी आया करतो।

ताजा जामन तोड़ बांदरो,

खूब खुवाया करतो।

अबै मगरमछ हील्यो-हील्यो

आंतो रोज अठीनै।

मीठा मीठा प्यारा-प्यारा,

मिलता और कठीनै।

खाटा मीठा मेवा तांतड़ौ,

बड़ै मजै सूं खांतो।

बातूनी बांदर नै दुनियां

भर री बात सुणांतौ।

धरती पर कितरा मीठा

फळ, बांदरो सदां बतांतो।

खा’र मगरमछ राजी हुंवतो,

आथण घर नै जांतो।

घर-बाहर री, आपस में,

बै बातां करता सारी।

मिलतां मिलतां इण विध

उण में, होगी पक्की यारी।

अब तो जितरा भी फळ

बांदर, मगरमच्छ तांई ल्यांतो।

आधा खुद खा, आधा घरवाळी नै

ले जा’र खुवांतो।

दो-च्यार दिन खा मुधरा

फळ, मगरमछणी बोली।

रोज खांवतो होसी मुधरा

फळ, थां रो हमजोली।

अै फळ खावणियै रो काळज्यो,

मीठो हो सी कितरो।

इण धरती पर नईं हुवैलो,

और कोई फळ इतरो।

अब कितणा फळ ल्यादौ

थां री बातां में नीं आऊँ।

म्हारो जी जद राजी

हुयसी, बांदर रो दिल खाऊँ।

मगरमछ अब रैवै अणमणो,

घर में हुयगी राड़।

सोच्यो रोज लड़ाई सूं तो,

करणी चोखी बाड़।

आज बांदरै पूछ्यो,

‘भाया! कीकर हुया उदास?’

दियो पडुतर, ‘बात तो है,

पण कोनी इतरी खास।’

मन में दुख हुवै तो

कै द्‌यो, आधो बंट जावैलो।

रळ-मिल नै कोसीस करां

तो, सगळो कट जावैलो।

हांस’र कैयो मगरमछ पाछै,

दिल रो हाल बतायो।

‘थां री भाभी थां नै

जीमण सारू घरां बुलायो।’

रोज-रोज मीठा फळ खाओ!

आछा मुफत खोर हो।

थे अेकर भी नईं जिमाया,

चंगा भला चोर हो।

बोलो! थे तो हो थळचर,

अर म्हे हां जळचर प्राणी।

म्हांरो घर तो है टापू

पर, पड़ै बिचाळै पाणी।

समझाई पण मानी कोनी,

के करूं औरत जात?

नीं खुद खाई, नईं खावण

दी, म्हनै रोटी रात!

साथै लेयनै नईं गयो जे,

म्हां रै घर माथै थां नै।

सोणो फेर पड़ैलो भूखो,

आज रात भर म्हानैं।

हांस’र बोल्यो बांदर, ‘भाया!

नाहक बात बधाई।

चालूं बैठ पीठ पर,

थांरी, मानैली भौजाई।’

राजी डाढो हुयो मगरमछ,

बांदर पीठ बिठायो।

होळै-होळै तिरतो-तिरतो,

बीच झील रै आयो।

बोल्यो, ‘भाया बांदर! सुणले,

सांची बात बताऊँ।

थांरी भाभी नित री कैवै,

बांदर रो दिल खाऊँ।’

इण कारण सूं ही थां नै

म्हैं, लेय’र आयो साथै।

झूठ बोल धोखो देणो

नीं, मंढणो म्हां रै माथै।

पैली बांदर डर्‌यो घणो,

फेर हांस’र बोल्यो भाई।

इतरी छोटी बात थे

म्हनै, पैली नईं बताई।

दिनगै-दिनगै धर देऊँ म्हैं,

काढ आप रै दिल नै।

अेक जगां लुकोय कठैई,

म्हैं दरखत रै बिल में।

दिल लेवण आपां,

भाया पाछो जाणो पड़सी।

दरखत रै बिल सूं दिल

काढ’र साथै ल्याणो पड़सी।

गै’लो घणो मगरमछ,

बांदर री बातां में आयो।

तावळ कर उणनै ओजूं

बो, जामन हेठां ल्यायो।

‘राम..! राम..!’ करतां अब

बांदर पाछो पूग्यो तट पर।

मार उछाळ ऊँचली डाळी

पर जा बैठ्यो झट कर।

दे लताड़ बांदरो बोल्यो,

रै मूरख तूं सुण ले।

देह सूं दिल हुवै नी नयारो,

अक्कल है तो गुण ले।

घणी पुराणी बात इयां सब,

स्याणा जन समझावै।

धीरज राखणियाँ संकट सूं

सदां पार पा ज्यावै।

स्रोत
  • पोथी : कुदरत रो न्याव ,
  • सिरजक : मंगत बादल ,
  • प्रकाशक : बोधी प्रकाशन, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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