तपता सूरज नै कहिज्यौ रे,

मुरथळ रा मिरगा नै छळैगौ नहीं।

तपता सूरज नै कहिज्यौ रे,

आग अंगारा सो बो बळैगो नहीं

सरवर सूख्या नदियां सूखी, ऊंडो कुवड़ां नीर गयो

तपता सूरज नै कहिज्यो रे,

गात गुमानण रो तो गळैगो नहीं।

गहरी-गहरी रूंख छिंयाळी, छींट सरीखी बणगी रे

कठै लुकावां कठै छुपावां, लू री निजरां तणगी रे।

तपता सूरज नै कहिज्यौ रे,

छायां नै तावड़ियै तळैगो नहीं।

सीयाळै बरसाळै पिव सूं दूर रही तो दोस नहीं

ऊनाळै में बीच आंगणै, बात नहीं तो होस नहीं

तपता सूरज नै कहिज्यौ रे,

मरवण रै महलां में टळैगो नहीं।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कल्याणसिंह राजावत ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-14
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