धरती री देह पै

नित बरसावै

सूरजड़ो आग,

पण बा नीं जाणै

कै आभै रा प्रेम में

आग में तप्योड़ी

कंचन माटी री देह

नित नुंवी ऊजळी

अर नित नुंवो सिणगार करै है।

भोर हुयां दिखावै

सूरज सुनैरा सुपना

हळवां-हळवां जमावै पांव

फेर बरसाणै लागै

कुचमादी आग

फफोला पड़ज्या है

कामणी री देह पै

होठ पपड़ाज्या है,

पण आभै री प्रीत में

धरती नीं भूलै

हरी चूंदड़ी में

सतरंगी फूल काडणो।

प्रीत रा पंथ में

ईंयां’ई बिछता रहसी

बाधावां रा अंगारा

ईंयां’ई करती रहसीं

म्हारी आतमा

नित नुंवो सिणगार,

म्हनै उम्मीद है

अेक दिन जरूर बरसैगी

प्रीतम री आंख्यां स्यूं

नेह री दो बूँद

जणा धरती अर आभै नै

मिलणै स्यूं कोई

नी रोक सकैलो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : राधेश्याम अटल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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