(अेक)
आंथ्योई नहीं दिन हाल
बीड़ी बुझगी
पाणी बरस्यो ई नहीं ईं साल
होग्यो सूखा चड़स ज्यूं जमारो
बूंळ्या के नीचे समटगी छाया सारी
कुण न्हाळ रहयो छै बाट
दिन दूरा छै हाल
अषाढ़ का।
(दो)
तालेड़ा की नदी सूखगी
मांगळी’ को मन मोल्ळाग्यो
खा रही पछाड़ां ‘घोड़ा पछाड़’ भाटां मं भड़भेटा मं
बंधा मं बंधरी ‘चम्बल’ का छालां की हरियास
तैर रही छै ऊंची पुळिया के पीन्दै कोरी काई
‘चन्द्रसेल, चन्दलोई’ की सेल मटरगी
सारोई पाणी संवळाग्यो
‘काळीसिन्ध’ करै तो कांई करै
धार टूटगी
‘परवण’ को पतियारो नं रहयो
‘तीनधार’ मं धार कोई न
‘पारबती’ की कुण पत राखै।
ताळ तळायां कुवा बावड़ी, नंदी नाळा
सब का सब सुसग्या
नहीं बच्यो अब जळ जीवन
कोई डाबरा कोई बीवरी मं
झुकबा लागरी मूंछ्यां धोळी झबरीली
पीळा स्याफा की रंगत पतळागी
कुण सुध लेगो ढांढा ढोरां की
अणबोल्याई तन तज देगा
गति प्राण हो गई बबावरी।
(तीन)
बा’ळ बह रही बळबळती
भस मं तणग्यो म’ल हंसे छै कुण
ऊभो छाया मं
पाणी बरसै छै कुणका करमां सूं
कुण का लखणां सू काळ पड़ै।