मैं तो

थां सूं सिंदूर मांग्यो हो

बिस्वासां री हत्या कर नै

लोही क्यूं भर दियो म्हारी मांग में?

जे भरणो ही हो तो

लोही नै सिंदूर रो नांव तो नीं देता

जिण सूं मैं बीं नै पूंछ सकती।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : अजन्ता चौधरी ,
  • संपादक : माणक तिवारी ‘बंधु’ ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अप्रेल, अंक - 02
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