मोठ-बाजरी अर फोफळियां रै नांव

अबै सांस्कृतिक चेतना नीं हुवैला

अर नीं बिलमैला

पोमचै अर चूनड़ी री बातां सूं लोग

गढां अर मिंदरां री पिछाण सूं

नीं चालैला आपणौ काम

क्यूंकै भूखौ मिनख

संस्कृति अर साहित्य री गोठां में

भूखौ रैय जावै...

अर उण में चेतना बापरै तो

फकत भूख री चेतना

पण अबै?

म्हारै लफांसां लेंवतै पेट नै

ठा हुयग्यौ है के

म्हारौ निपजायोड़ौ मोठ-बाजरौ

कित्तौ म्हैं खाऊं अर कित्तौ दूजा खावै

म्हारा बणायोड़ा मिंदरां अर गढां में

कित्तौ म्हैं रेऊं अर कित्ता दूजा रैवै

अर चूनड़ी पोमचां री सोवणी तस्वीरां बिचै

म्हारी लुगाई रौ लूगड़ौ अर

म्हारै साफै रा आंटा ओजूं फाट्योड़ा है

सुणी है के म्हारी फोटू अखबार में छपी है

अर म्हैं सांस्कृतिक चेतना री

खरी ओळखाण हूं।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : श्याम महर्षि ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : फरवरी 1986
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