नैणां में सूनोपण जमियोड़ो पाळै-सो

मरियोड़ी देही पर आंच रो लिबास,

अैड़ो बुत अबै-अबै नैणां सूं गुजर्‌यो है।

फुटपाथी नाळ्यां में

पसर्‌योड़ो मिनखपणो,

रोजीनी किरळावै

होटां पर मंडियोड़ी

भूख री नदी नै

आंतड़ियां भरमावै;

जीवण रै मरूथळ में उखड़्योड़ी सांसा,

सुपना रै मिंदर री डूबती उजास।

अेड़ै-छेड़ै अबै-अबै स्यापो सो पसर्‌यो है।

भरम री जमीं पै

बांझड़ियै वादां रो

डोळी कुण चिण रैयो?

टूट्योड़ै दरपण में

टूट्योड़ै चैरै रा

टुकड़ा कुण गिण रैयो?

खुद नै ही ढूंढण नै, खुद नै ही पीवण नै,

घूम रैयी सड़कां पर जींवती ल्हास

सांसा साथै मन में कांई तो उतर्‌यो है।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : कृष्ण कल्पित ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अप्रेल, अंक - 02
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