मिनखा जूण री अेकल पड़

हाडकां रै रावण हत्थै री

तांत हेटै

मढ़ी मढ़ाई मजबूरियां रो

पलट-पलट नै पीड़ीजतौ

रीकणौ रियाज है।

पण अचंभौ इणरौ कोनी

और तौ इणरौ है कै

अंकोड़ै सूं लेय

ओटम तक लांबौ

समै रै तुजरबै रौ गज

फेरूं ही आदमी रै हाथ में है

कवि जद चावै

उणरौ पुणचौ पकड़

रियाज रौ रूपक बदळ देवै

पण अै औसर रा आड़तिया

समै माथै आवतै सुर में

आपरौ अठताळौ

मांडै ही ऊंधाय देवै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : नारायण सिंह भाटी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 11
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