मिनख री जूण हजारी है,

आंधा देखै, गूंगा बोलै, दुनियादारी है।

सरपच चालै पांगळिया तो दूरां भागै लूला,

एक पांत रा जीमण हाळा, अलग-अलग पण चूला।

काग की लीला न्यारी है।

अणहोणी सी लागै बा ही जीवण री है होणी

चौरासी मै छप्पन जुड़गा मारग दीसै कोनी।

कष्ट हिवड़ै मै भारी है।

चापलूस-बटमार-निसरड़ा जग मै कीरत गावै,

पढ्या-लिख्या तो रूळता, अनपढ़ मूठ्यां भर-भर खावै।

राम पै रावण भारी है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : तारादत्त निर्विरोध ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 26
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