जग जाणै बांकड़ला करतब, राजस्थानी बीरां रा

चारण कवि भाटां री बाणी अमर हुया जस मीरां रा

जीं गोदी में खेल्या कुद्‌या जीं आंगणियै बडा हुया

जीं भासा में बडकां री बिरदावळ सुणता खड़्या हुया

वा म्हारी मायड़ भासा चौपड़ ऊभी सुबकै है

पूतां कानी देख-देखकर हुबक-हुबक कर हुबकै है

बेटां आगै हाथ पसार्‌यां मायड़ करै पुकार रे

पूतां थकां लुटैलो मेरो भरी सभा सिणगार रे

सभा सोहणी दीखै है पण कुरुवां रो दरबार है

खड़्या झपट्टो मारण बैरी दुस्सासण अवतार है

मायड़ भासा री पत राखो देकर थे बलिदान रे

मान मर्तबो अैंको होसी मां रो राख्यां मान रे

थे चाहो तो चुड़लो पहरो थे चाहो तो तरवार रे

ल्याळी दुबकर दूर में बैठ्यो सिंघ पूत हुंकार रे

कदे घटसी मोल कठैई मेरा जाया हीरां रा

वचन निभावण वीरां रां वां बांकड़ला रणधीरां रा।

स्रोत
  • पोथी : मरूवाणी ,
  • सिरजक : दिनेश मिश्र ,
  • संपादक : रावत सारस्वत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान भासा प्रचार सभा, जयपुर ,
  • संस्करण : 11-12 (नवम्बर-दिसम्बर)
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