गाभोंरो गैहरो रंग देख,
मनड़ै री बात बता मती,
ऊपर सूं निरा रूप देख,
हिवड़ै री हाट सजा मती।
चोळै में चिपिया चार चोर,
पड़दै री पोल खुल जासी,
पतियारो राखै प्रीत रो,
‘मरवण’ रा मौजी कोई हुवै।
हुवै ज्यूं आगै हूवण दे,
लोहै पर काठ रैवण दे,
सोनै पर झोळ चढ़ियोड़ो,
ऊघड़तौ असली हुय जासी।
आगै सूं डूंगर दीखै है,
रूपाळा रंग रा रमतिया,
नेड़ै सूं निजर देख लीजै,
पत्थरों पर पत्थर पड़िया है।
दुनिया नै परखै देख भाळ,
चूल्है पर तपतै तवै ज्यूं,
भावों रो भ्रम मिट जासी,
बंधियोड़ो भारो खुल जासी।
कण-कण ने भेळा कुण करसी,
हाथों री हिम्मत हट जासी,
नेणों में होसी रातिन्दो,
पलकों रो पाणी ढुळ जासी।
सपनो तो केवल सपनो है,
आवै है पाछा जावै है,
असली तो जीणो और,
आरै पर लकड़ी आवण दे।
सागर री लहरों देखी है,
अन्दर री आग देखी नीं,
नदी नै निरमळ देखी है,
‘हबौळा’ लेती देखी नीं।
धरती रो धीरज देख्यो है,
लावै री लपटों देखी नीं,
मैहलों री मैहफिल देखी है,
फुटपाथों पड़िया देख्या नीं।
काया रै कैई कार्यां है,
करमों री कावड़ खुलण दे,
तकड़ी री तणियों तोल मती,
मिनख रो ‘मान’ घट जासी।
भरम नै भरम रैवण दे,
छैड़ण सूं नाग छिड़ जासी,
पांखण्ड री पालों बांधोड़ी
हाकै सूं हाफै हट जासी।