पानां नै कुण सिखायौ कंपणौ,
हिलणौ अर बोलणौ?
पानां री हरियाळी,
मरमर री धुन,
हवा सूं हिळ-मिळ’र
कित्ती गै’री बातां कैय जावै—
कै आज पान हरिया है,
कालै पीळा व्हैला,
अेक दिन झड़ैला।
इण नस्वर संसार में
सदैव कोई नीं ठै’रै।
फूल—
बसंत रौ सिणगार,
फूटरापै री खांण,
मदभरी फुहार री
मोहक सुर-लहरी,
छिण भर में पूरी स्रिस्टी
सौरम सूं भर’र
अबोलौ ई झर जावै—
म्हैं पानां सूं ठै’रणौ
अर
फूलां सूं झड़णौ जाण्यौ
सुवारथ रौ भाव तज’र
फूल कैवै—
‘खिलणौ
कोई उपलब्धि कोनी।’
पान कैवै—
‘टिक’र रैवणौ ई
तपस्या है।’
आ हरी-भरी अवनि
पांना-फूलां छाई बाड़ी है।