पांगळी,
अधगावली,
जियाजूण नै
ढोवते-ढोवतै
सांस निसर जासी
थारी अेक दिन।
ओ म्हारां भायलां, म्हारा साथीड़ा!
इण वास्तै,
इण जूण नै घी-दूध पाय’र
तगड़ी बणाव
लूंठी बणाव
लड़ाकू कर
अर पांगळी करणै आळी इण सत्ता नै
धूड़ रै ढिगळै ज्यूं खिंडाय दे।
नीं तो
अे लोई पीवणिया चींचड़,
थारी छाती माथै बैठ्योड़ा पैणिया सरप
दीठ निरलज्ज
नेता-मन्तरी, साब-साऊकार
उदई ज्यूं सुळाय देवैला सगळां नै!
फेर नीं रैवैला
आपणौ वजूद अर ओळखाण।