सुण्यौ कै मौत

जीवण री पूंछेट हुवै;

जठै सगळा मारग

भेळा हो'र अलोप हुय जावै

अर अेक अणजाण सून

पसर जावै..

ब्रह्माण्ड रै पिण्ड माथै

पण म्हैं कोनी मान सकूं..

सगळौ विधान!

म्हैं कई बार मरूं

कठै मारग अलोप हुवै?

कठै सून बापरै?

हर बखत म्हारी जिनगाणी

सरकती-सी लागै।

जद म्हैं मरूं

म्हनै चूफेर घेर लेवै..

ओडी भरिया मारग धूंधळका,

अळगा ऊभा मोड़ रा भाठा..

सैन्यां कर बुलावै;

सून री जगां पसरै..

भीड़ रौ उफणतौ बाळौ।

सगळा चावै कै म्हैं

उण री आंगळी पकड़लूं;

पण उणी टेम म्हनै सुणीजै..

अंतस रौ हेलौ।

अर म्हैं सगळां नै नकार

ऊजड़ में पग मांडतौ..

मंजळ दिस्या चाल पड़ूं।

उणी टेम मौत रा वौपारी

म्हनै भेंट देवै..

मौत रौ अेक ओरूं तोहफौ

अर म्हैं गवां बैसूं

अबार तांई री

सै उपलब्धियां

म्हैं धुंधळकां में घिर जावूं।

जीवण रै पूंछेठ तक री जातरा

ठा नी म्हैं किती बार मरूंला?

अेक नाटक अेक सींगौ

कद तांई चालतौ रैसी?

म्हनै जीणौ पड़सी

पगडण्डी बणाबा खातर..

मंजळ तांई जावा खातर।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : पुरुषोत्तम छंगाणी ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : जून, अंक 04
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