“इतरो फैल्योड़ो ब्रह्माण्ड

जीं राई जेड़ी प्रिथ्वी

प्रिथ्वी पर

जाणे कितरा देस,

राज्य, नगर, गाँव

ज्यां अरबों जनम्या

अरबों मरग्या

अरबों जी रह्या है

सबरा न्यारा-न्यारा

विचार,

न्यारी-न्यारी चिन्तावां

राग, द्वेस, घ्रणा, अनुभूत्यां

व्यां म्हूं

अकिंचन सो

समंद टपके री जियां

एक तुणकल्यो सो

म्हारा खुद रा

विचार, चिन्तावां, राग, द्वेस

घ्रणा, अनुभूत्यां

ईं विशालतम

मूं की भी तो नी

फेरूं भी

खुद ने मानुं

बौत कुछ

अर् ईं खयाल रा

दरसाव तांई

जी रह्यो हूं

अपणा ही मिजाज म...।

स्रोत
  • पोथी : अणकही ,
  • सिरजक : कैलाश मण्डेला ,
  • प्रकाशक : यतीन्द्र साहित्य सदन (भीलवाड़ा) ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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