दुनियां सूं

अठै बचपन सूं

सीधौ बुढापौ आवै

जवानी रौ पानौ

बेरौ नीं कुण पाड़ ज्यावै?

जिनगाणी अेक-अेक सांस सूं

अक्कम पेल करै

रात रै सरणाटै में

रेत भी गीत गावती सुण जासी

कुदरत भी अठै

रोज-रोज नुवां खेल करै।

रेत रै तपतै समंदर में

रेत रै भंवर में?

मौसम—

सिरफ कस्मीर, कुल्लू, मसूरी

ऊटी अर स्विट्जरलैंड में कोनी,

अठै भी है।

कदै सुकाळ में पधारौ

थार समंदर रौ न्यूतौ है थांनै

देख्या फेर ठंडी च्यानणी रात में

रेत रौ हेत

अर थै कह उठस्यौ—

‘गर फिरदौस बररुअे जमीं अस्त

हमींअस्त! हमींअस्त! हमींअस्त!’

धोरां री ढाळ पर

हठ जोगी-सा

अेक टांग पर ऊभा खेजड़ा

गैरी साधना में व्यस्त है

अर बळती दोफारी में बोलती कमेड़ी

किणी भगत ज्यूं

रामनामी धुन में मस्त है

अठै हरेक जीव सांस-सांस में

जिनगाणी सूं जंग करै;

बै चित्राम थांनै अठै कठै मिलसी?

जठै फागण

फूल-फूल में नुंवा-नुंवा रंग भरै?

स्रोत
  • पोथी : माणक पारिवारिक राजस्थानी मासिक ,
  • सिरजक : मंगत ‘बादळ’ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन
जुड़्योड़ा विसै