मेळौ आयौ गांव में,

रंग बिखरग्या रेत में।

ढोल नगारां री गूंज

डोलर हींडै री पींगां

लुगायां रा चूड़ा चिलकै,

बाळां रौ आणंद।

कठपुतळी नाचै डोरी में,

राजा-परजा जुद्ध।

सौदागरां री हांक सुणौ—

‘सस्ता! सस्ता! ले लौ भाई!’

पण हर चीज सूं अठै मूंगौ है

मिलणौ अर बिछड़णौ।

सांझ पड़्यां जद दीप जळै,

मेळौ थक-थक सो जावै,

रात रुकै जद आंख्यां में

मेळौ दीखै सुपनां में।

स्रोत
  • पोथी : सुवालड़ी (राजस्थानी कविता संग्रै) ,
  • सिरजक : प्रमिला शंकर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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