खेतां री मेड़ माथै चालै है ढेकली।

थारी म्हारी याद में, व्हैगी है बेकली॥

थारा पग री चाप सूं, केसूला मचळ गया

कजरारा नैणां सूं, देवता संभळ गया

गौर बरण गौरड़ी

नाच उठी मोरड़ी

खिलगी है कळी-कळी।

सांसां रै उफाण में, सौरम थारी छा गई

आमड़ली री ओट में, हांसी थारी भा गई।

धोरां री रेत में

सरसों रा खेत में

चाली कठै छळी-छळी।

हिवड़ा में गूंज रैयी, अळगोजा री टेर

राधाजी सुध-बुध भूली, ग्वाळां रा ढेर

कानाजी रूस गया

मधुर तार टूट गया

रूसी क्यूं आज अली।

खेतां री मेड़ माथै, चालै है ढेकली।

थारी मीठी याद में, व्हैगी है बेकली॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : विनोद सोमानी ‘हंस’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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