सुपना में बड़बड़ावता

टाबर नै मा छाती रै लपा लेवै

उणरै माथा माथै हाथ फेरै

उणरा मोर थपेड़ै

सुपना में कटकटी खाता

टाबर नै मां जगा’र

पाणी पिलावै

अर पाछौ सुवाण देवै

थप थपा’र

कांई खिलकौ है

हरेक मां यूं क्यूं करै

सुपनां मांय टाबर व्हौ

के मोट्यार के बूढो

उणरै अचेतन रो

वो ईज सिरजक

अर वो भोक्ता

फेर मां उणनै क्यूं बरजै

उणरै अचेतन मांय

आपरै चेतन नै

क्यूं सिरजै?

सांच तो है के

मां चेतन अर अचेतन रै

बिच्चै अेक पुळ है

वा टाबर री

अचेतन सूं चेतन

अर चेतन सूं अचेतन री

हरेक जातरा री साखी

मां साक्षात चेतना है

वा कदैई नीं चावै के

उणरौ लाडलौ सुपना में

कोप करै, बड़बड़ावै

भूंडी बात मूंडै सूं काढ़ै

मां ममता री मूरत कही जावै

पण म्हनै यूं लखावै

के मां अहिंसा री

सै सूं बड़ी मूरत है...

अहिसां री आदमकद मूरत।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भगवती लाल व्यास ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
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