जळ फकत जळ नीं है
धरती री आतमा है।
माटी में प्राण है
पारवतां आंनैं देख,
माटी सूं मांग,
आपरा बणाया
माटी रा गणेस जी में प्राण भर्या।
गणेस जी जलम्या नहीं।
गणेस जी आज भी माटी रा बणै।
आंसू सिरजण है
देही रो।
धरती आपरी छाती रो दूध
प्यार फिरता नै पाळै।
विसद रूप देवै।
अै धरती री छाया है।
भाव नीं
अर्थ सबद री आतमा है।
मन री परकरती सांत नीं है,
असांत है।
जीभ सुवाद बतावै
खावै नीं।
पर दांत सूं डरै।
अैड़ी कलम नीं लेणी
जिकी साच नै आपरै सुवारथ निगळै
निगळ ले, गिट जावै।
सूरज सोवै कोनी
जाग’र आपां उठां।
परभात आपणै खातर है।
सांवरा!
पंचतत्वां रो नयो घोळ बणा
नयो आदमी घड़
धरती नै जरूरत है।
आदमी इतरो बोल्यो है कै
धरती रा आंखा सबदकोस अधूरा है
अपूरण।
कवीसरां!
कविता में कविता
दिखणी चाहिजै,
लिख्या सै सबद
कविता नीं है।
आप नै धरती में बोवोला तो
ऊगोगा!
ग्यान में आपरै अग्यान नै मत ना उछाळो
चोट लाग जावैली।
लोक भासावां में रचियोड़ा
लोकगीतां मांय
जमीन री खसबू है—गजब!
बाती रोसनी री मां है,
दीपक तो बाती रो तमासो है।
गुड़ खातर गूंगा मत ना बणो
ओ गळत है।
मुंहफट इतरा भी मत ना बणो कै
मुंह ई फाट जावै।
सोवणो रूप साहित्य री
तीन आतमावां में अेक है।
साहित्यकार रै चेहरै पर सरम होणी चाहिजै।
राजनीति रै चेहरै सारू आ जरूरी नीं है,
इण वास्तै कै साहित्यकार बेसरम नहीं हुवै।
साहित्य
धरती कै मतलब री चीज है।
उमर रै काच मांय देख्या है मिनखां नै
बांरा चेरा भी बदळग्या, अर
वै भी बदळग्या।
मौत सरीर नै नी खावै
जीवण रो भख लेवै।
धरती पर
मां रै बिना
पिता रो अरथ नीं हुवै।