किसी भोळपण

मां भुळी नीं

गायो दीपक राग?

क्यूं गायो दीपक राग?

स्यात, जगत मां

जगर-मगर दिवलां री जोतां

देखण री ही मन

मां म्हारै

स्यात अठै जो घट-घट व्याप्यो

अंधियारो ठालो बैठ्यो है

मिनखां रै हिरदै चढ्यो है

रात काटणै उणरी

गायो दीपक राग।

दिसा-दिसा दीसै उजळाई,

दीपै जग रो हर-हर कूंणो

इस्या-इस्या

कर-कर कितरा मता विचार

कोड-कोड मां

भूल्यो-भूल्यो

गायो दीपक राग।

हाय!

जोतां जगर-मगर नीं होई

दिवलां री बात्यां भी रोई

घट्यो ढेरमढेर अंधारो

ना दीपी ना उजळी होई

कोई दिसा

जिस्या रा जिस्या

रैयग्या

सगळा मनसूबा

बळै काळजो

क्यूं कै गाय दीन्यो

मैं दीपक राग।

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : अक्टूबर
जुड़्योड़ा विसै