किता लोग अंया का हैं

जिका फकत आपकी ही सोचै

स्वार्‌थ तो बांकी नसा में

कूट-कूट कर भरेड़ो रवै।

फालतू की जिद

बिना बात को गुस्सो

बात-बात में गळती

भर-भर कै लालच

अर जद मन करै

कोई को भी

अपमान करणै में

पाछै कोनी हटै।

अै सब खुद करै जणां

कोई बात कोनी

अगर कोई दूसरो कर लेवै

तो बळ'र भूंगड़ो हो ज्यावै...

अर तन बदन में आग

लाग ज्यावै

भगवान ही बचावै

अंयां कै बिगड़ेड़ा सांडां सूं।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बनवारीलाल अग्रवाल ‘स्नेही’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-44
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