कऊ बुझ्यां पछै—

रात री आखरी सांसां,

राख ठाडी पड़ी,

अर आसमान

हळकौ उजळ्यौ।

खेतां मांय—

ओस उतरी

जांणै कोई मां री

हथाळी माथा माथै मेली।

कऊ री राख अजै ऊनी ही—

रात रौ डर मिट्यौ कोनी

गांव री लुगायां उठी,

अर होठां माथै चुप लियां

काम में लागगी।

मोट्यारां री आंख्यां में

काल री रात रौ धुंवौ

अर बळती कऊ रौ घेरौ हौ।

ठाकर रै हुकम सूं डर री छींया साफ ही

ठाकर रै हुकम में लुगायां वास्तै

कऊ तापण रौ सख्त

पाबंदी रौ अैलान हौ।

अेक लुगाई,

कऊ री राख—

हथाळी में ली,

वा फूंक दी अर राख उडगी।

अेक लपट कऊ में

फेर जळती रैयी।

आग बुझै

या नीं बुझै

पण वे समझगी—

कऊ बुझ्यां पछै

आग सदा इज जीवती रैवैली।

स्रोत
  • पोथी : कऊ री झाळ ,
  • सिरजक : प्रमिला शंकर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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