अेक टेम बा भी हौ

थारै-म्हारै बिचाळै कोई अंतरपट नीं हौ

मौसम री धोखाधड़ी नै ले’र

आपां माथा-पच्ची कदी नीं कीधी

जनवाणी रा म्हारा जुगचेता ड्योढीदारां!

साहित री ठकुरायत आपां कदी करी कंईं?

पगोपग आपां—लगोलग

सदा साथै रैया, किणी सूं नीं डर्‌या

पण

अचांणचक आपां अेक अंधारै सूं घिरग्या

बीछड़्या तो इस्या बीछड़्या क’

आपणी सरजण रा दिनमान ही फिरग्या

ज्यूं-ज्यूं ठंडौ-टीप अर ढीठ अंधारौ छंट्यौ

तौ

म्हूं जठै हौ बठै अकड़ग्यौ

अेक-अेक कर घणकरा कलम-गोठिया

अर म्हारा पाणीदार भायला

देखतै-ई-देखतै काळनेमी उजाळै सूं

मीठी दीठ मिलायनै

आप-आप रा घोड़ा छिंया हेटै बांध लिया

अेक दिन बूढै अंधारै

मन्नै आपरै पाळै सूं बारै कर दियौ

सफा सूनी हुयोड़ी जुग-चिंतना नै

मैं घणी झकझोरी पण बा नीं जागी

किरायै री जिनगाणी

अर उधार हाथ रोटी-पाणी

खुदोखुद काया रौ कायौ पींजरौ लियौ

म्हूं हांफतौ रैयौ सफा अेकलौ

जिकै-जिकै आखरां नै हेलौ मार्‌यौ

जिकी-जिकी मात्रावां मैं नूंत भेजी,

अर जिका-जिका सपनां रा दीवा संजोया—

बां सगळा मन्नै हत्तौ-तत्तौ अर

ठालौ-भूलौ मान्यौ!

म्हूं अेकांत अर सांत पड़्योड़ै समै मांय

घणी वार ऊंडौ-ऊंडौ धूजतौ रैयौ

पण म्हूं अंधारै रै पाछै-पाछै नीं बैयौ

कलम रौ वेग, सडक रौ हेज और आत्मा रौ तेज

हर घड़ी संकट बेळा में साथै रैयौ

म्हूं बचग्यौ

बचगी म्हारी अंत:करण री ओळ

नीं चायौ काल

नीं चाऊं आज

कोई राजवी फरमान!

अबै कठैई अंधारौ नीं है

है तौ है....

हां, उजास रौ धोखौ

म्हारा जनम-जनम रा साथ्यां!

थे इत्ता दिन कठै हा?

बोलौ नीं म्हारा व्हाला कलमी सिकलीगरां!

म्हूं सदा सरीखौ, धार-धार तीखौ

थांरौ अेक आखर हूं

थांरी मात्रा हूं

मारगियै री झीणी सौरम रेत

म्हूं थांरी जात्रा हूं

टेम है

म्हारा संगेत्यां!

फेरूं आवो, आपां अेकम-अेक हुयनै

टूट पड़ां

लोक वाणी रा तस्करियां, मठाधीसां

अर भासाऊ खईसां माथै!

आओ!

आपां सड़क री धड़कन सुणां

खेतां री बाड़ां रै कांटां री तीख आंकां

आओ!

आपां पंगत रै लारै-ई-लारै ऊभा

मिनखां अर लुगायां नै बतळावां

मैला हुयोड़ा साहित रा संदरभां अर

पितळाईज्योड़ा अरथां झांका

आओ!

आपां हिवड़ै सूं हिवड़ै रा तार मिळावां

आपां अेक समरथ देस बण जावां!

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थांनी मासिक) ,
  • सिरजक : ओंकार श्री ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : अप्रैल 1983
जुड़्योड़ा विसै