जेठ री लूवां जद चालै

स्रिस्टी में लूवां रा नूवा गीत

पांगर जावै।

लू कोई हवा कोनी

थार रौ बळतौ अतीत,

अर दूजौ वगत—

जकौ घड़ियां में नीं,

रेत री देही में बळै।

लूवां में दाझती देह रौ

भरोसौ कम पड़ जावै

बळती लूवां में

मिनख री छींया तकात

साथ छोड देवै।

अै कुवां रै पींदै तांई

ऊंडी उतरै

अर जावती

मिनख री उमर कम

करती जावै।

लूवां रै आगै रूंख

नमै कम

अर झुळसै घणा।

लूवां में जीव-जिनावर

थाक’र इंया ठै’र जावै—

जिंया मौत री वाट जोवै।

लू में मरुधरा अर

लुगाई री देह

सबसूं पैला तूटै।

असल बात तौ है—

लू पिछम धरा री पिछाण है—

खिमतावान बणण री।

स्रोत
  • पोथी : सुवालड़ी (राजस्थानी कविता संग्रै) ,
  • सिरजक : प्रमिला शंकर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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