आवौ चालाँ
दूर घणी दूर
पहाड़ाँ पे, कै कोई न्हँ कोई
सुनसान जंगल में
व्हाँ ई बणावाँ
आपणौ घर
ज्हाँ रहाँ आपां दोनी
एकला, एकदम एकला
न्हँ होवै आपणाँ बीच
हवा कौ परदौ
ज्हाँ म्हाँका प्रेम का कबूतर नै
न्हँ होवै डर
कीं बी बुरी नजर का बाज कौ
ज्हाँ झूठी-मूठी रीताँ-रिवाजाँ की
न्हँ बहती हो हवा
प्यार सूँ नफ़रत करबा हाळा
पत्थर-दिल न्हँ होवै ज्हाँ मिनख
ज्हाँ प्रेम न्हँ लाग्या होवै प्हैरा
ज्हाँ लैला पे न्हँ फाँक्या जाता हो भाटा
न्हँ चुणी जाती होवै
अनारकली भींताँ में
आऔ चालाँ
आपाँ व्हाँ ई जा’र
बणाँवाँ
आपणौ घर...