लोकतंत्र-रो, हाल देख’र

नेतावां-री, चाल देख’र

घर-घर बढ़तो, काळ देख’र

महंगाई बेताळ, देख’र

चैन भागग्यो दोफारां।

लाय लगाता, दाम देख’र

आंख्यां मांय, काम देख’र

मिंदर मांय, जाम देख’र

जात-पांत में, राम देख’र

चैन भागग्यो दोफारां।

रोता खेत किसान देख’र

रेवड़ में इंसान देख’र

झूठ रो, अभिमान देख’र

सांसां अटकी, जान देख’र

चैन भागग्यो दोफारां।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : पूजाश्री ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-33
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