लोकतंत्र-रो, हाल देख’र
नेतावां-री, चाल देख’र
घर-घर बढ़तो, काळ देख’र
महंगाई बेताळ, देख’र
चैन भागग्यो दोफारां।
लाय लगाता, दाम देख’र
आंख्यां मांय, काम देख’र
मिंदर मांय, जाम देख’र
जात-पांत में, राम देख’र
चैन भागग्यो दोफारां।
रोता खेत किसान देख’र
रेवड़ में इंसान देख’र
झूठ रो, अभिमान देख’र
सांसां अटकी, जान देख’र
चैन भागग्यो दोफारां।