चारूमेर चेतो भूल्योड़ै,
अबखाई री आंधी रै
चक्कर चढ़ियै,
मृग तृष्णा रै लारै दौड़तै,
तिरसै हिरण री
अबोली जीभ री अरदास
कुण सुणै?
भूख रै ऊंचै भूतोळियै
गरणाटा खावतै,
पग-पग पछाड़ खाय
गिरतै पड़तै माणस रै
उकळतै आंतरै री
दो धापाऊ बात
कुण सुणै?
मैंगाई री मार सूं करळावतै,
मिलावट री मूढ
धाराळी सूं टुक-टुक हुयोड़ै
हाडकां रै
अन्तस री खड़खड़ाट नै
कुण सुणै?
तिरसा, भूखा, दुखिया
सगळा आस लगायोड़ी
दिन रै सूरज अर
रात रै चंदरमा नै
निरखै-परखै,
पण तिरस भूख’र दुख
आगा नी सरकै!
धोरां, तालरां अर मगरां सूं
टकरावती
चारूमेर अेक ई आवाज
कुण सुणै?
कुण सुणै?