ओळ्यूं आवै

उण भायलां री

जका अबै

नीं है इण

दुनियां में।

वां रै साथै करता

बोल-बंतळ

अर बांटता

सुख-दुख नै

आपसरी में...

अबै नीं रैया बै

रैयगी फकत

उण री ओळ्यूं।

बडेरा होंवता थकां भी

बै हरमेस म्हारै साथै

करता बरताव

भायलै दांई।

उण री ओळ्यूं सूं

बध जावै म्हारै

अन्तस री पीड़

बै अबै नीं रैया।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : श्याम महर्षि ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-33
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