आभै रै काळजै में

कठै सियांत

च्यारूंमेर

पीळे मूंडै रा उणमणा बादळ

अळसायोड़ी उडीक रै माथै

उगण लाग्या मौत री छिब रा

अणचावा अैनाण

कांईं हाल

देखो पेट रा

हांफळ्योड़ा सवाल

काळ!

फगत लूंठो काळ!

दाबतो आवै धरती री मरोड़

मिनख री मरजादा

भूख,

सिरैनांव भूख

कळपावै इतियास री कूख

मिनख,

मिनख सारू मौत री

बिगत बणावै

टांग पसारै

मौत रा बतूळिया

हंसतै आंगण में

स्यात घणै दिनां पछै

अेकर हुवै बड़ो नाटक

मिनखपण री गळफांसी रो

कंठां रो लोयी सूखै

धूजै ईमान रा

सैंठा थांभा।

मौत रै पसवाड़ै

ताकत रा खांधां सूं

चुवै पसीनौ

अड़बड़ लागै

कुदरत रो रोज-रोज

आपघात करणू।

काळ!

मिनख नै मोटा कर

खून रा घर मत भर

रै नीं कर पड़छींया नै लांबी

मत तोड़

उगतै सुरजी रा दांत।

काळ, थारी लगाम नै थोड़ी सांभ...

जूण रा मत उडा

फरचटा

थारै इतियास नै सुमर

अर फेरूं सुगन ले।

स्रोत
  • पोथी : आज री कवितावांं ,
  • सिरजक : गोरधनसिंह शेखावत ,
  • संपादक : हीरालाल माहेश्वरी, रावत ‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍सारस्वत ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादेमी ,
  • संस्करण : pratham
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