खींपड़ा-आकड़ा

हुय सकै—

थारी निजरां में

अळसीड़ो

कूटळो

डेरा सांप-बिच्छु रा

नीं किणीं काम रा

अर ना ही लागै फूटरा

क्यूं कै आं में

नीं हुवै सौरम भर्‌या फूल

अर ना हुवै खावण जोग फल

पण—

फरक है थारी अर म्हारी दीठ में

अै इज म्हारी प्रेरणा रा स्रोत है

सूखी रेत में

बिना पाणी

बिना रुखाळी उग’र

संघर्‌ष रै सागै जीवण री

सीख देवै म्हानै।

मरुधर री पिछांण—

खींपड़ा-आकड़ा

इंयां सूं ही

बढैली महत्ता मरुधरा री।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मदन गोपाल लढ़ा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
जुड़्योड़ा विसै