(1)

आप आया तो त्रिताप नै हरता आया
विहग-गळ गीत मधुर भरता आया
ओस कण बण टपक्या, बन-उपबन
झील में कमल-कमल पग धरता आया।

(2)

थारी मांग, सुंई सांझ रो सिन्दूर सजै
परभात री लालाई, थारै होठां पै रचै
सूरज है सजै आपरै हिय-हार रो हीरो
मस्तक पै ससी सुहाग रै टीकै सो रजै।

(3)

थारी आँख, कै सागर रो भरम आवै है
आकास री उपमां ई ज्यूं कम आवै है
है फूल थारै मुक्ख आडा फीका
थारा होठ, कै किळियां नै सरम आवै है।

(4)

आप चालो हो’क अलड़ किसोरी कोई
खेतां मैं उझड़ बैवती गोरी कोई
हाथां सूं बगै छूवती फसलां रा सिरा,
सुण ब्याव रो समचार ज्यूं छोरी, कोई।

(5)

हांचळ सूं थारै, प्रेम री धारा फूटै
काम रै धनख ज्यूं पै’प रा सर छूटै
अै रस-कळस आपरा, बांटै इमरत
आपरी ओट, महाकाळ रा बंधन टूटै।

(6)

लाल बादळ रो ओ धारो, आ लकीर
सुर्‌ख ज्यूं खून मैं भीज्योड़ी, समसीर
मुलमुल रै कोई पोत सी झीणौ-झीणौ
आभै री अलंगणी पर सूकै थारो चीर।

(7)

आपरी साध रा, सरधा रा बण्या मिन्दर
ज्यूं अमरापुरी रा कोई टुकड़ा, मिन्दर
आप मिन्दर मैं रैवो तो मिन्दर, मिन्दर
आपरी छिव नीं बिराजै तो किसा, मिन्दर?

(8)

आप जाग्या तो जगत मांय जागण होयो
आंख खुलतां ई नये ऊठ, नये नै जोयो
एक-एक जगाया थे थारा आळा-भोळा,
एक-एक रो ओस कणा, मुंह धोयो।

(9)

थारी चाल सूं सीख्या है जिंया चाल हिरण
मुख आब सूं फूटी है थारै, जोत किरण
मारा थारो मीठास, लियो बोली रो
धोरां री ईं धूळ लियो गोर वरण।

(10)

सुईं सांझ अै रंग बदळता बादळ
थारै रूप री गिरमी सूं पंघळता, बादळ
सूरज नै पुगावै है कोई सैंन सनेसौ
थारी मांग रै सिन्दूर मैं ढळता बादळ।

(11)

या कोई साप सूं सीखी है आ पगडंडी
नकल करणै मांय तीखी है आं पगडंडी
कियां बळ खावती जावै है मिजाजण, देखौ।
आप री चाल सरीखी है आ पगडंडी।

(12)

थांनै देखण तांई राह रा रज-कण उछळै
थारै सुवागत मांय सीमाड़ री खेती हरखै
थारौ आदाब बजावै है लुळ-लुळ सिट्टा
थारै मुजरै मांय दूधिया कूं-कूं थिरकै।

(13)

सुवागत रो ओ संगीत, आ गीतां री झड़ी
बेथाग लुगायां है ज्यूं पीपळ मैं बड़ी
सूरज री बनी, किरण खड़ी है फळसै
रग-चाव सूं भूवड़ नै बधारै है, चिड़ी।

(14)

आप आया तो आं डै’रा मांय सुर गूंज्या
आप आया तो ज्यूं आंधां नै हिंया सूं सूझ्या
किल्लोळ चढ्यो पवन, थारी आमद सुण’र
झुक-झूम’र बणराय थारा पग पूज्या।

(15)

सदियां में ई कोई कणा नाचता देख्या
देख्या तो ई थोड़ा घणा नाचता देख्या
दिन रात छमा छम, इण नीम री डाळ्यां,
म्हूं आपनै देख्या जणां नाचता देख्या।

(16)

आपरी आंख है’क श्लोक कोई गीता रो
आपरी आंख है’क सत है सती सीता रो
या योग सूं उपज्योड़ी कोई ध्यान री विधि,
खोलै है जिकी द्वार अकथ प्रीतां रो।

(17)

थारै लिलाड़ रो लाली अर ओ सूरज
थारै मुख-मण्डल माथै उगतो सूरज
अै शिवालिक सिखर है ज्यूं भुवरा थारा
बीच रै मांय है, सुहाग रो टीको सूरज।

(18)

सामीं तूं थोड़ी टिक’र खड़ी हो तो लिखूं
चित्राम सी चौखट में जड़ी हो तो लिखूं
सूरत थारी छिन एक ई थिर नीं रैवै
कीं बे’ल थांनै एक दो घड़ी हो तो लिखूं।

(19)

मुंह लाल पसेवां सूं है तर गाबा
ज्यूं एक ई होगी हुवै, तूं अर गाबा
मूरत है तूं ज्यूं कोई मकराणै री
जिण रो हुवै डील अर, पत्थर, गाबा।

(20)

ताण, लीलो वितान कुअै पर
सहेल्यां नै बुला’न कुअै पर
करै है गांव री छोर्‌यां साथै
उषा कातिक-स्नान कुअै पर।

(21)

कविता रो म्हारो रूप सुंवारो तो हुवै
म्हूं कपूत नै, निज पूत सीकारौ तो हुवै
वरदायनी! आपरी उरमाळ म्हारै
सबदां रा अै पुहुप ही धारौ तो हुवै।
स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मोहन आलोक ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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