जन और तन्त्र
दोन्यू रो अेक ही मूल मन्त्र है
देस स्वतन्त्र है
टाबर-जिणां नै
सुर, तुलसी, रहीम, रसखान रा पदां रो
अरथ बतावणो हो,
सुतन्तरता संग्राम रो इतिहास समझावणो हो,
ज्ञान, विज्ञान, कला, राजनीति री
गुत्थियां सुलझावणो हो,
जद उणां रा पग
बालपणां में मदरसां री ठौड़ मजदूरी खातर मुड़ै
तो म्हने लागै मिनख-मिनख कोनी रैयो
रोटी कपड़ा मकान री जुगत में बणग्यो अेक मशीन रो यन्त्र है
देस स्वतन्त्र है।
जिणां हाथां नै उठणो हो
“तूही राम है, तू ही रहीम है” री प्रार्थना सारू
वै बगत सूं पैला जद तगारी उठावै,
पेचकस घूमावै, हथौड़ो चलावै अर अंगूठो लगावै
काळो अक्षर भैंस बरोबर बतावै
तो म्हनै लागै—मिनख, मिनख कोनी रैयो
चाबी वाळो खिलोणो बणग्यो
जिण री जूण चाबी भरणिया रै हाथ है
वो परतन्त्र है—देस स्वतन्त्र है
सदीव सूं जो घर-परिवार में
मां बहिन, बेटी, बींदणी रै रुप में
आदर जोग, लाडेसर प्यारी है
वा ही अबला, अणभणी, लाचार-बिचारी है
उण सूं त्याग— बलिदान री अपेक्षा है
पण उण री घणी उपेक्षा है
उण रो शोषण है, उण री हत्या है
उण पर अत्याचार है
वा मिनख री पाशविक क्रूरता री शिकार है
जो खुशियां देवै, वंश बधावै
उण नै ही मिनख सतावै
तो म्हनै लागै
मिनख नै आपणी पै लाज शरम क्यूं नीं आवै?
म्हैं कैवूं— टाबर अर नारी दोन्यूं महान है
देस रो वर्तमान है, देस रो भविष्य है,
देस रो वरदान है
कद दोन्यूं शिक्षा रो महत्व पिछाणैगा?
कद— दोन्यूं जागैगा?
कद अन्धारो भागैगा?
नमो शिक्षा, नमो नारी, नमो जागृति
म्हारा चिन्तन अर चिन्ता रो बीज मन्त्र है
देस स्वतन्त्र है।