देखो! ओ अंधारो,
पे’लां उतरै धोरां ऊपर, फेर उतरै गाँव पर।
फोग, खेजड़ी, कैर, बोरटी,
देखै खड़ा-खड़ा।
काळ, तूफान अर आँधी सूं,
नित-नित घणा लड़ां।
लाग्या दूभरिया!
जिनगाणी अर मौत बिचाळै,
आ कुण मांडी चर-भर?
अेक कोचरी पाँख्यां काळी,
बैठी घात में।
सरणाटै री लीक खींच दौ,
ढळती रात में।
आभै टूटयो् तारो,
अर धरती रै हिड़दै बसग्यो,
अेक बावळो डर।
धुँअै गर्द रा मेघ,
उठता दीसै उतराद सूं।
कितरी देर बच्यौ रैसी,
अैड़ी कुचमाद सूं।
कुण पिछाण करै?
मिनख मारणो मून पसरग्यौ,
बस्ती में घर-घर में।