म्हैं, बरतोल्त ब्रैख्त, काळा जंगळां रौ निवासी हूं।

मां म्हनै पेट में लियां इज नगर में आयगी ही।

अर जठा तांई म्हैं झड़ नीं जाऊं,

जंगळां री ठंड म्हारै सूं अलग नीं व्हैला।

कोलतार रै नगर में म्हैं प्रसन्न इज हूं,

म्हैं सरू सूं इज मौत रा सगळा प्रतीकां समेत हूं—

समाचार पत्रां सूं, दारू सूं, अर तम्बाकू सूं

संदेही अर आळसी अर आखिरकार संतोसी।

लोग म्हनै परसण करै है

म्हैं वांरी रीत रै मुजब ‘बाउलर टोप’ लगाऊं हूं।

म्हैं कैवूं के बडा नुक्ताचीण लोग है अै!

पण कोई बात नीं, म्हैं खुद अैड़ौ इज हूं।

सवार री बगत कदै-कदै म्हैं कीं लुगायां नै

म्हारी झूलणी कुर्सियां माथै बैठाय’र राजी-राजी

वांनै देखतौ रैवूं हूं अर वांनै कैवूं—

म्हैं अैड़ौ आदमी नीं हूं जिण माथै विस्वास कर सकौ।

सिंझ्या रा म्हैं म्हारै कनै पुरसां नै भेळा करूं हूं।

म्हां सगळा अेक-दूजा नै ‘श्रीमान्’ कैय’र बतळावां हां।

वै म्हारी मेज माथै पग पसारनै बैठे अर कैवै—

जल्दी इज सब ठीक हुय जावैला। पण कदै, म्हैं नीं पूछूं।

सवार री भूरी उरमा में देवदार उदासी सूं हिलण लागै अर

पंखेरू'र वांरा टाबर रोवण लाग जावै, उण बगत म्हैं

नगर में म्हारो गिलास खतम करूं हूं अर सिगार

फेंक’र चिंतित मुदरा में सोवण नै जाऊं परो हूं।

यां नगरां सूं जिको गुजरै है, वो इज बाकी रैवैला—यानी हवा।

लोग घर में प्रसन्न रैय'नै उणनै खाली कर जावै है

म्हांनै पतौ है के म्हां भूमिका मात्र हां अर म्हाणै पछै

अठै जिकी वस्तु आवैला—वा उल्लेखजोग नीं होवैला।

आगामी धराकम्प में म्हनै आसा है के

खारास रै कारण म्हैं म्हारी सिगरेट नीं फेंकूंला—

म्हैं, बरतोल्त ब्रैख्त, काळा जंगळां सूं घणा समै पैली

मां रै पेट में रैवतां थकां इज, कोलतार रा नगरां में

फेंकीजियो।

स्रोत
  • पोथी : अपरंच अक्टूबर-दिंसबर 2015 ,
  • सिरजक : बरतोल्त ब्रैख्त ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : अपरंच प्रकासण
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