सावण रा सजळ मेघ!

प्रेमिल घन चितचोर!

थूं तौ बरस बरस बरसाळ

भादौ रा भूपाळ।

सगळा खोल्या बंध—

थारौ घणौ-घणौ उपकार,

चंचळ-चपळ खिंवै बीजळी

घिर्‌यौ घोर अंधार।

अेकलौ मन डरपै-कांपै खोवै धीर अपार,

बरस-बरस बरसाळ,

थारौ घणौ घणौ उपकार।

बळिहारी है मरुधरा

मुगध हुया मन प्राण,

इमरत निरझर झरै

छूटै दिग्दिगंत रा त्राण,

थूं तौ बरस-बरस बरसाळ

भादौ रा भूपाळ

थारी निरमळ जळ री धार!

बणी मोरचंग काया म्हारी—

थिरकै दे दे ताळ, हरिया हिवड़ै रा संताप।

थूं तो बरस बरस बरसाळ

थारी इमरत जळ री धार!

स्रोत
  • पोथी : सुवालड़ी (राजस्थानी कविता संग्रै) ,
  • सिरजक : प्रमिला शंकर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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