आं धोरां में आय’र रुळगी,

कठै नदी री धार?

ऊँची-नीची लहर

कठै

बीहड़ में अटकी?

उतर सिखर सूं

हेठां गुमसुम

बाळू में भटकी?

पवन फफेड़ा दिया

तो डर’र गेलो बदळ लियो?

अगस्त मुनि ज्यूं पीग्यो या तो

तिरसां मरतो थार।

धरा कुवाँरी

करै उडीकां

बूंद-बूंद पाणी नै तरसै।

पण आभै री

सूनी आँख्यां

सूं, नईं नीर नेह रो बरसै।

करै तपस्या रेत रात-दिन

‘पाणी-पाणी’ जाप जपै

बादळ बिजळी रा सपनां भी

हो जासी साकार!

स्रोत
  • पोथी : कवि रै हाथां चुणियोड़ी ,
  • सिरजक : मंगत बादल ,
  • प्रकाशक : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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