म्हारी जाण में हूं

डील रै महताऊ अंगांनै

गाभां सूं लुकायोड़ा राखूं।

पण

लोगां री निजरां

मनै नागो देखणो चावै।

बां री दीठ में म्हारो डील

कोई अजूबो हुवै

अैड़ी बात कोनी।

ठौड़ सर तो सगळां नै ही

नागो हुयां सरै।

ढक्योड़ै आसरै में

जद हूं गाभा उतारूं

रोसनदान सूं चिप्योड़ा

बां रा चसमा एक्स-रे मसीन ज्यूं

म्हारी साव नागी तसवीर

उतारणी चावै।

मैं म्हारो नागो डील

उणां रै फोकस सामो कर देवूं

सोच’र कै–

म्हारो नागापणो सोधण में

उणांनै कोई तकलीफ नीं हुवै।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : जय व्यास ,
  • संपादक : माणक तिवारी ‘बंधु’ ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.)
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