कळी-कळी घूंघट सूं झांकी

बहक गई कोयल काळी।

आडो ऊंळो, अज मतवाळो,

नाच्यो वाव दियां ताळी।

गोरी-गोरी, कंवळी-कंवळी, कळियां में कुण मुळकै है।

गोरी गावै, जन-मन थिरकै,

महकी सरसूं री क्यारी।

ठूंठ सरसग्या, फूल बरसग्या,

जोबन री छिब है न्यारी।

होळै-होळै हरवळ-हरवळ, कुण अमराई महकावै है।

हियै गिलगिली, भोळी भंवरी

बहकै गुण मुण गावै है।

चटक-मटक अर चहक चुल बुली

तिरलोकी नै भावै है।

छानै छानै, छम्मक-छम्मक, घूघर कुण घमकावै है।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : मोर पांख ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अप्रेल, अंक - 02
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