आज री भोर

म्हैं पढ़ी

सूरज री किताब।

म्हारै पोर-पोर में

सौ-सौ सूरज रो उजाळो

घर करण लाग्यो है।

पैलां तो म्हैं डर्‌यो हो,

पण अब मन रस्तै में

आग्यो है,

चौकड़ी भरतै हिरण ज्यूं

मन दौड़ण लाग्यो है,

घर में गूंज रह्यो है

बच्चां री किलकार्‌यां रो

सुहाणो संगीत

सांची कैऊं

सूरज री किताब

पढ़ण रै बाद

म्हैं लगातार

जाग र्‌यो हूं

लगातार..।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : प्रेमचन्द्र गोस्वामी ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : जुलाई, अंक 05
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